Chapter 5
Coordination Compounds
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समन्वय यौगिक (Coordination Compounds)
समन्वय यौगिक वे यौगिक हैं जिनमें एक केंद्रीय धातु परमाणु या आयन के चारों ओर कई आयन या अणु उपस्थित होते हैं, जिन्हें लिगैंड (Ligands) कहा जाता है। लिगैंड केंद्रीय धातु परमाणु या आयन से उपसहसंयोजक बंध (Coordinate Bonds) द्वारा जुड़े होते हैं।
1. योगात्मक यौगिक (Addition Compounds)
जब दो लवणों के जलीय विलयनों को आपस में मिलाकर क्रिस्टलीकरण किया जाता है, तो एक योगात्मक यौगिक बन सकता है।
योगात्मक यौगिक मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं:
- द्विक लवण (Double Salts)
- संकुल लवण (Complex Salts)
2. द्विक लवण (Double Salts)
द्विक लवण वे योगात्मक यौगिक हैं जो जलीय विलयन में अपने घटक आयनों में पूर्णतः वियोजित हो जाते हैं।
उदाहरण:
- पोटाश फिटकरी (Potash Alum) – K₂SO₄·Al₂(SO₄)₃·24H₂O
- मोहर लवण (Mohr's Salt) – FeSO₄·(NH₄)₂SO₄·6H₂O
द्विक लवण जलीय विलयन में अपनी पहचान खो देते हैं, क्योंकि वे अपने घटक आयनों में पूर्णतः वियोजित हो जाते हैं।
3. संकुल लवण (Complex Salts)
संकुल लवणों में एक संकुल आयन (Complex Ion) होता है, जो जलीय विलयन में अपनी पहचान बनाए रखता है और सरल आयनों में पूर्णतः वियोजित नहीं होता है।
उदाहरण: K₄[Fe(CN)₆]
इस यौगिक में [Fe(CN)₆]⁴⁻ एक संकुल आयन के रूप में उपस्थित रहता है।
4. समन्वय यौगिकों में प्रयुक्त महत्वपूर्ण पद
संकुल आयन (Complex Ion)
केंद्रीय धातु परमाणु या आयन के लिगैंडों के साथ संयोजन से बनने वाले आयन को संकुल आयन कहते हैं।
केंद्रीय धातु परमाणु या आयन (Central Metal Atom or Ion)
समन्वय इकाई (Coordination Entity) के केंद्र में उपस्थित धातु परमाणु या आयन को केंद्रीय धातु परमाणु या आयन कहा जाता है।
ऑक्सीकरण संख्या (Oxidation Number)
ऑक्सीकरण संख्या, समन्वय यौगिक में केंद्रीय धातु परमाणु या आयन को दी गई ऑक्सीकरण अवस्था अथवा आवेश को दर्शाती है।
समन्वय संख्या (Coordination Number)
केंद्रीय धातु परमाणु या आयन से सीधे जुड़े लिगैंड के दाता परमाणुओं (Donor Atoms) की संख्या को उसकी समन्वय संख्या कहते हैं।
आयनीकरण मंडल (Ionisation Sphere)
वर्ग कोष्ठक के बाहर उपस्थित आयन आयनीकरण मंडल का निर्माण करते हैं। ये आयन जलीय विलयन में आयनित हो सकते हैं।
समन्वय मंडल (Coordination Sphere)
वर्ग कोष्ठक के भीतर उपस्थित केंद्रीय धातु परमाणु या आयन तथा लिगैंड मिलकर समन्वय मंडल का निर्माण करते हैं।
उदाहरण: [Co(NH₃)₆]Cl₃
- [Co(NH₃)₆]³⁺ समन्वय मंडल है।
- Cl⁻ आयन आयनीकरण मंडल में उपस्थित होते हैं।
लिगैंड (Ligand)
वह आयन या अणु जो केंद्रीय धातु परमाणु या आयन को इलेक्ट्रॉनों के एक या अधिक एकाकी युग्म (Lone Pairs) दान कर सकता है, लिगैंड कहलाता है।
दंतुकता (Denticity)
किसी लिगैंड के उन दाता परमाणुओं की संख्या, जिनके माध्यम से वह केंद्रीय धातु परमाणु या आयन से समन्वय स्थापित करता है, उसकी दंतुकता कहलाती है।
5. संकुलों के प्रकार (Types of Complexes)
होमोलेप्टिक संकुल (Homoleptic Complex)
जिस संकुल में केवल एक ही प्रकार के लिगैंड उपस्थित होते हैं, उसे होमोलेप्टिक संकुल कहते हैं।
उदाहरण:
- [Ni(CO)₄]
- [Co(CN)₆]³⁻
- [Fe(CN)₆]³⁻
हेटेरोलेप्टिक संकुल (Heteroleptic Complex)
जिस संकुल में एक से अधिक प्रकार के लिगैंड उपस्थित होते हैं, उसे हेटेरोलेप्टिक संकुल कहते हैं।
उदाहरण:
- [Co(NH₃)₄Cl₂]⁺
- [Pt(NH₃)₂(H₂O)₂]²⁺
6. लिगैंडों का वर्गीकरण (Classification of Ligands)
लिगैंडों को उनके आवेश तथा दंतुकता के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है।
एकदंतुक लिगैंड (Monodentate Ligands)
वे लिगैंड जिनमें केवल एक दाता परमाणु होता है, एकदंतुक लिगैंड कहलाते हैं। इनकी दंतुकता एक होती है।
उदासीन लिगैंड (Neutral Ligands):
- NH₃ – ऐम्मीन (Ammine)
- H₂O – एक्वा (Aqua)
- CO – कार्बोनिल (Carbonyl)
- py – पिरिडीन (Pyridine)
- PH₃ – फॉस्फीन (Phosphine)
धनायनिक लिगैंड (Cationic Ligands):
- NO⁺ – नाइट्रोसोनियम (Nitrosonium)
- NO₂⁺ – नाइट्रोनियम (Nitronium)
- NH₄⁺ – अमोनियम (Ammonium)
ऋणायनिक लिगैंड (Anionic Ligands):
- F⁻ – फ्लोरिडो (Fluorido)
- Cl⁻ – क्लोरिडो (Chlorido)
- Br⁻ – ब्रोमिडो (Bromido)
- I⁻ – आयोडिडो (Iodido)
- OH⁻ – हाइड्रॉक्सिडो (Hydroxido)
- CN⁻ – सायनिडो (Cyanido)
- O²⁻ – ऑक्सिडो (Oxido)
- S²⁻ – सल्फिडो (Sulfido)
- N³⁻ – नाइट्रिडो (Nitrido)
- H⁻ – हाइड्रिडो (Hydrido)
- NH₂⁻ – एमिडो (Amido)
द्विदंतुक लिगैंड (Bidentate Ligands)
वह लिगैंड जो दो दाता परमाणुओं के माध्यम से समन्वय स्थापित करता है, द्विदंतुक लिगैंड कहलाता है। इसकी दंतुकता दो होती है।
उदाहरण:
- एथेन-1,2-डाइऐमीन (Ethane-1,2-diamine, en)
- ऑक्सालेटो आयन (C₂O₄²⁻)
एथेन-1,2-डाइऐमीन में दोनों नाइट्रोजन परमाणु दाता परमाणुओं के रूप में कार्य करते हैं।
7. समन्वय संख्या (Coordination Number)
समन्वय संख्या केंद्रीय धातु परमाणु या आयन से सीधे जुड़े दाता परमाणुओं की संख्या पर निर्भर करती है।
उदाहरण:
- [Ni(CN)₄]²⁻ – समन्वय संख्या = 4
- [Fe(CN)₆]³⁻ – समन्वय संख्या = 6
- [Co(en)₃]³⁺ – समन्वय संख्या = 6, क्योंकि प्रत्येक en लिगैंड द्विदंतुक होता है।
8. समन्वय यौगिकों का IUPAC नामकरण
समन्वय यौगिकों के नामकरण के लिए निम्नलिखित नियमों का प्रयोग किया जाता है:
- सबसे पहले धनायन (Cation) और उसके बाद ऋणायन (Anion) का नाम लिखा जाता है।
- समन्वय मंडल के भीतर केंद्रीय धातु परमाणु या आयन से पहले लिगैंडों के नाम लिखे जाते हैं।
- लिगैंडों के नाम वर्णानुक्रम (Alphabetical Order) में लिखे जाते हैं।
- सरल लिगैंडों की संख्या दर्शाने के लिए di-, tri-, tetra-, penta- तथा hexa- जैसे उपसर्गों का प्रयोग किया जाता है।
- जटिल अथवा बहुदंतुक (Polydentate) लिगैंडों के लिए bis-, tris- तथा tetrakis- जैसे उपसर्गों का प्रयोग किया जाता है।
- लिगैंडों के नाम के बाद केंद्रीय धातु का नाम लिखा जाता है।
- केंद्रीय धातु की ऑक्सीकरण अवस्था को कोष्ठक में रोमन अंकों में लिखा जाता है।
- ऋणायनिक संकुल (Anionic Complex) में केंद्रीय धातु का नाम सामान्यतः '-ate' पर समाप्त होता है।
उदाहरण:
- [Cr(NH₃)₆]Cl₃ – Hexaamminechromium(III) chloride
- [Pt(NH₃)₂Cl₂] – Diamminedichloridoplatinum(II)
- K₃[Fe(C₂O₄)₃] – Potassium tris(oxalato)ferrate(III)
- [Ni(CO)₄] – Tetracarbonylnickel(0)
- [Fe(CO)₅] – Pentacarbonyliron(0)
9. केंद्रीय धातु की ऑक्सीकरण संख्या
केंद्रीय धातु की ऑक्सीकरण संख्या की गणना समन्वय इकाई के कुल आवेश तथा लिगैंडों के आवेशों को ध्यान में रखकर की जा सकती है।
उदाहरण: K₄[Fe(CN)₆]
मान लीजिए Fe की ऑक्सीकरण संख्या x है।
x + 6(-1) = -4
x = +2
अतः Fe की ऑक्सीकरण संख्या +2 है।
उदाहरण: [Fe(C₂O₄)₃]³⁻
x + 3(-2) = -3
x = +3
10. समन्वय यौगिकों के सिद्धांत
समन्वय यौगिकों के लिए निम्नलिखित महत्वपूर्ण सिद्धांतों का वर्णन किया गया है:
- वर्नर का सिद्धांत (Werner's Theory)
- संयोजकता बंध सिद्धांत (Valence Bond Theory – VBT)
- क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (Crystal Field Theory – CFT)
- आणविक कक्षक सिद्धांत (Molecular Orbital Theory)
11. वर्नर का सिद्धांत (Werner's Theory)
समन्वय यौगिकों में बंधन को समझाने के लिए अल्फ्रेड वर्नर ने वर्नर का सिद्धांत प्रस्तुत किया।
वर्नर के अनुसार केंद्रीय धातु परमाणु या आयन दो प्रकार की संयोजकताएँ प्रदर्शित करता है:
- प्राथमिक संयोजकता (Primary Valency)
- द्वितीयक संयोजकता (Secondary Valency)
प्राथमिक संयोजकता (Primary Valency)
- यह केंद्रीय धातु की ऑक्सीकरण संख्या को दर्शाती है।
- यह सामान्यतः ऋणात्मक आयनों द्वारा संतुष्ट होती है।
- यह आयनीकरण योग्य (Ionisable) होती है।
- यह अदिशात्मक (Non-Directional) होती है।
- इसे समन्वय मंडल के बाहर उपस्थित आयनों द्वारा दर्शाया जाता है।
द्वितीयक संयोजकता (Secondary Valency)
- यह केंद्रीय धातु की समन्वय संख्या को दर्शाती है।
- यह लिगैंडों द्वारा संतुष्ट होती है।
- यह अनायनीकरण योग्य (Non-Ionisable) होती है।
- यह दिशात्मक (Directional) होती है।
- यह संकुल की ज्यामिति निर्धारित करती है।
- इसे समन्वय मंडल के भीतर उपस्थित समूहों द्वारा दर्शाया जाता है।
उदाहरण: [Co(NH₃)₆]Cl₃
- Co की प्राथमिक संयोजकता = 3
- Co की द्वितीयक संयोजकता = 6
12. संयोजकता बंध सिद्धांत (Valence Bond Theory – VBT)
संयोजकता बंध सिद्धांत समन्वय यौगिकों के बंधन, संकरण (Hybridisation), ज्यामिति तथा चुंबकीय व्यवहार को समझाता है।
VBT के अनुसार केंद्रीय धातु परमाणु या आयन, लिगैंडों द्वारा दान किए गए इलेक्ट्रॉनों के एकाकी युग्मों को ग्रहण करने के लिए रिक्त कक्षक उपलब्ध कराता है।
केंद्रीय धातु के कक्षक संकरण करके समान ऊर्जा वाले संकर कक्षक बनाते हैं। लिगैंड अपने एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म इन रिक्त संकर कक्षकों में दान करते हैं।
प्रबल-क्षेत्र एवं दुर्बल-क्षेत्र लिगैंड (Strong-Field and Weak-Field Ligands)
लिगैंड केंद्रीय धातु आयन के d-इलेक्ट्रॉनों की व्यवस्था को प्रभावित करते हैं।
- प्रबल-क्षेत्र लिगैंड (Strong-Field Ligands) इलेक्ट्रॉनों का युग्मन करा सकते हैं।
- दुर्बल-क्षेत्र लिगैंड (Weak-Field Ligands) सामान्यतः d-इलेक्ट्रॉनों का युग्मन नहीं कराते हैं।
स्पेक्ट्रोकेमिकल श्रेणी (Spectrochemical Series)
लिगैंडों को बढ़ती हुई लिगैंड-क्षेत्र शक्ति (Ligand-Field Strength) के अनुसार व्यवस्थित किया जा सकता है। स्रोत में लिगैंड-शक्ति का क्रम स्पेक्ट्रोकेमिकल श्रेणी द्वारा दर्शाया गया है, जिसमें I⁻ तथा Br⁻ जैसे लिगैंड दुर्बल-क्षेत्र की ओर तथा NH₃, en, NO₂⁻ और CN⁻ जैसे लिगैंड प्रबल-क्षेत्र की ओर स्थित होते हैं।
चुंबकीय व्यवहार (Magnetic Behaviour)
किसी समन्वय यौगिक की चुंबकीय प्रकृति अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति पर निर्भर करती है।
- एक या अधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन वाला संकुल अनुचुंबकीय (Paramagnetic) होता है।
- जिस संकुल में कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं होता, वह प्रतिचुंबकीय (Diamagnetic) होता है।
चुंबकीय आघूर्ण अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या से संबंधित होता है।
μ = √[n(n + 2)] BM
जहाँ n अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या है।
13. संकरण एवं ज्यामिति (Hybridisation and Geometry)
समन्वय संख्या तथा संकरण के आधार पर समन्वय यौगिकों की ज्यामिति अलग-अलग हो सकती है।
- समन्वय संख्या 4: sp³ संकरण सामान्यतः चतुष्फलकीय (Tetrahedral) ज्यामिति देता है।
- समन्वय संख्या 4: dsp² संकरण वर्ग-समतलीय (Square Planar) ज्यामिति देता है।
- समन्वय संख्या 6: d²sp³ या sp³d² संकरण अष्टफलकीय (Octahedral) ज्यामिति देता है।
आंतरिक-कक्षक संकुल (Inner-Orbital Complex)
जब आंतरिक (n−1)d कक्षक संकरण में भाग लेते हैं, तो ऐसे संकुल को आंतरिक-कक्षक संकुल कहते हैं।
समन्वय संख्या 6 के लिए d²sp³ संकरण अष्टफलकीय आंतरिक-कक्षक संकुल बनाता है।
बाह्य-कक्षक संकुल (Outer-Orbital Complex)
जब बाहरी nd कक्षक संकरण में भाग लेते हैं, तो ऐसे संकुल को बाह्य-कक्षक संकुल कहते हैं।
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