Chapter 4
The d- and f-Block Elements
Preview The d- and f-Block Elements for Chemistry in JAC 12th (SCI.).
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d- एवं f-ब्लॉक तत्व (The d- and f-Block Elements)
d- एवं f-ब्लॉक तत्व अकार्बनिक रसायन (Inorganic Chemistry) का एक महत्वपूर्ण भाग हैं। d-ब्लॉक तत्वों को सामान्यतः संक्रमण तत्व (Transition Elements) कहा जाता है, जबकि f-ब्लॉक तत्वों को आंतरिक संक्रमण तत्व (Inner Transition Elements) कहा जाता है।
1. d-ब्लॉक तत्व (d-Block Elements)
वे तत्व जिनमें अंतिम इलेक्ट्रॉन (n−1)d कक्षक (Orbital) में प्रवेश करता है, d-ब्लॉक तत्व कहलाते हैं।
सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास:
(n−1)d1–10 ns0–2
आवर्त सारणी में d-ब्लॉक तत्व, s-ब्लॉक तथा p-ब्लॉक तत्वों के बीच स्थित होते हैं।

2. संक्रमण तत्व (Transition Elements)
वे तत्व जिनके परमाणुओं में या उनकी कम-से-कम एक सामान्य ऑक्सीकरण अवस्था में d-कक्षक आंशिक रूप से भरे होते हैं, संक्रमण तत्व कहलाते हैं।
अधिकांश d-ब्लॉक तत्व संक्रमण तत्व होते हैं। हालांकि, समूह 12 के तत्व जैसे Zn, Cd तथा Hg को सामान्यतः संक्रमण तत्व नहीं माना जाता, क्योंकि उनके परमाणुओं तथा सामान्य आयनों में d-कक्षक पूर्ण रूप से भरे होते हैं।
उदाहरण:
Zn = [Ar] 3d104s2
Zn2+ = [Ar] 3d10
3. d-ब्लॉक तत्वों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
d-ब्लॉक तत्वों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है:
(n−1)d1–10 ns0–2
प्रथम संक्रमण श्रेणी (3d Series)
प्रथम संक्रमण श्रेणी स्कैंडियम (Sc) से जिंक (Zn) तक होती है।
- Sc: [Ar] 3d14s2
- Ti: [Ar] 3d24s2
- V: [Ar] 3d34s2
- Cr: [Ar] 3d54s1
- Mn: [Ar] 3d54s2
- Fe: [Ar] 3d64s2
- Co: [Ar] 3d74s2
- Ni: [Ar] 3d84s2
- Cu: [Ar] 3d104s1
- Zn: [Ar] 3d104s2
क्रोमियम तथा कॉपर असामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास प्रदर्शित करते हैं, क्योंकि अर्ध-भरे (Half-Filled) तथा पूर्ण रूप से भरे (Completely Filled) d-उपकोशों में अतिरिक्त स्थायित्व होता है।
4. संक्रमण तत्वों के सामान्य गुण
- धात्विक प्रकृति
- उच्च गलनांक
- उच्च परमाणुकरण एन्थैल्पी
- परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएँ
- रंगीन आयनों तथा यौगिकों का निर्माण
- उत्प्रेरकीय गुण
- अंतराकाशी यौगिकों का निर्माण
- मिश्रधातु निर्माण
- चुंबकीय गुण
- संकुल निर्माण
5. धात्विक प्रकृति (Metallic Character)
संक्रमण तत्व धातु होते हैं। ये सामान्यतः कठोर, आघातवर्धनीय (Malleable) तथा तन्य (Ductile) होते हैं और ऊष्मा तथा विद्युत के अच्छे चालक होते हैं।
इनकी धात्विक प्रकृति संयोजकता इलेक्ट्रॉनों द्वारा बनने वाले मजबूत धात्विक बंधन (Metallic Bonding) से संबंधित होती है।
सामान्यतः अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों (Unpaired Electrons) की अधिक भागीदारी से धात्विक बंधन अधिक मजबूत होता है।
6. गलनांक (Melting Points)
संक्रमण धातुओं के गलनांक सामान्यतः मजबूत धात्विक बंधन के कारण उच्च होते हैं।
धात्विक बंधन की मजबूती बंध निर्माण के लिए उपलब्ध इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करती है।
प्रथम संक्रमण श्रेणी में गलनांक सामान्यतः श्रेणी के मध्य की ओर बढ़ते हैं और उसके बाद घटने लगते हैं।
मरकरी (Hg) का गलनांक असामान्य रूप से कम होता है और यह कमरे के तापमान पर द्रव अवस्था में पाया जाता है।
7. परमाणुकरण एन्थैल्पी (Enthalpy of Atomisation)
किसी तत्व की मानक अवस्था में उसके एक मोल को अलग-अलग गैसीय परमाणुओं में परिवर्तित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा को परमाणुकरण एन्थैल्पी कहते हैं।
मजबूत धात्विक बंधन के कारण संक्रमण तत्वों की परमाणुकरण एन्थैल्पी सामान्यतः अधिक होती है।
सामान्यतः अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या अधिक होने पर धात्विक बंधन अधिक मजबूत होता है और इसलिए परमाणुकरण एन्थैल्पी भी अधिक होती है।
8. परमाण्विक एवं आयनिक त्रिज्या (Atomic and Ionic Radii)
संक्रमण श्रेणी में बाएँ से दाएँ जाने पर परमाण्विक त्रिज्या प्रारंभ में सामान्यतः घटती है और उसके बाद इसमें बहुत कम परिवर्तन होता है।
इसका कारण नाभिकीय आवेश में वृद्धि के साथ-साथ d-कक्षकों में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों का परिरक्षण प्रभाव (Shielding Effect) है।
d-इलेक्ट्रॉनों द्वारा परिरक्षण बहुत प्रभावी नहीं होता है। इसलिए श्रेणी में बाएँ से दाएँ जाने पर प्रभावी नाभिकीय आवेश सामान्यतः बढ़ता है।
9. आयनन एन्थैल्पी (Ionisation Enthalpy)
किसी पृथक गैसीय परमाणु से एक इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा को आयनन एन्थैल्पी कहते हैं।
संक्रमण तत्वों की आयनन एन्थैल्पी सामान्यतः श्रेणी में धीरे-धीरे बढ़ती है, हालांकि यह प्रवृत्ति पूर्णतः नियमित नहीं होती है।
यह प्रवृत्ति मुख्य रूप से निम्न कारकों पर निर्भर करती है:
- नाभिकीय आवेश (Nuclear Charge)
- परमाणु का आकार (Atomic Size)
- परिरक्षण प्रभाव (Shielding Effect)
- इलेक्ट्रॉनिक विन्यास का स्थायित्व
10. परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (Variable Oxidation States)
संक्रमण तत्व परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं, क्योंकि ns तथा (n−1)d कक्षकों की ऊर्जाएँ एक-दूसरे के बहुत निकट होती हैं।
इसलिए ns तथा (n−1)d दोनों कक्षकों के इलेक्ट्रॉन बंध निर्माण में भाग ले सकते हैं।
महत्वपूर्ण ऑक्सीकरण अवस्थाएँ:
- Sc: +3
- Ti: +2, +3, +4
- V: +2, +3, +4, +5
- Cr: +2, +3, +6
- Mn: +2, +3, +4, +6, +7
- Fe: +2, +3
- Co: +2, +3
- Ni: +2
- Cu: +1, +2
- Zn: +2
मैंगनीज कई ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करता है, जिनमें +7 इसकी उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था है।
11. ऑक्साइड एवं फ्लोराइड (Oxides and Fluorides)
संक्रमण तत्व विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाओं में ऑक्साइड तथा फ्लोराइड बनाते हैं।
उच्च ऑक्सीकरण अवस्थाएँ सामान्यतः ऑक्सीजन तथा फ्लोरीन जैसे अत्यधिक विद्युतऋणात्मक तत्वों द्वारा स्थायी बनाई जाती हैं।
- निम्न ऑक्सीकरण अवस्था वाले ऑक्साइड सामान्यतः क्षारीय (Basic) होते हैं।
- मध्यवर्ती ऑक्सीकरण अवस्था वाले ऑक्साइड उभयधर्मी (Amphoteric) हो सकते हैं।
- उच्च ऑक्सीकरण अवस्था वाले ऑक्साइड सामान्यतः अम्लीय (Acidic) होते हैं।
12. उत्प्रेरकीय गुण (Catalytic Properties)
संक्रमण धातुओं तथा उनके यौगिकों का व्यापक रूप से उत्प्रेरक के रूप में उपयोग किया जाता है।
इनका उत्प्रेरकीय व्यवहार उनकी परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाओं तथा अभिक्रियाओं के दौरान मध्यवर्ती स्पीशीज (Intermediate Species) बनाने की क्षमता से संबंधित है।
उदाहरण:
- हैबर प्रक्रम (Haber Process) में Fe का उपयोग उत्प्रेरक के रूप में किया जाता है।
- कॉन्टैक्ट प्रक्रम (Contact Process) में V2O5 का उपयोग किया जाता है।
- हाइड्रोजनीकरण अभिक्रियाओं (Hydrogenation Reactions) में Ni का उपयोग किया जाता है।
13. अंतराकाशी यौगिक (Interstitial Compounds)
जब H, B, C तथा N जैसे छोटे परमाणु संक्रमण धातुओं के क्रिस्टल जालक (Crystal Lattice) के अंतराकाशी स्थानों में प्रवेश कर जाते हैं, तब अंतराकाशी यौगिक बनते हैं।
उदाहरण: TiC, Mn4N तथा Fe3C।
अंतराकाशी यौगिकों के गुण
- ये सामान्यतः अस्टॉइकियोमेट्रिक (Non-Stoichiometric) होते हैं।
- ये कठोर होते हैं।
- इनके गलनांक उच्च होते हैं।
- इनमें धात्विक चालकता बनी रहती है।
- कई स्थितियों में ये रासायनिक रूप से निष्क्रिय होते हैं।
- इनकी आघातवर्धनीयता तथा तन्यता सामान्यतः कम हो जाती है।
14. मिश्रधातु निर्माण (Alloy Formation)
संक्रमण धातुएँ आसानी से मिश्रधातुएँ बनाती हैं, क्योंकि उनकी परमाण्विक त्रिज्याएँ लगभग समान होती हैं।
उदाहरण:
- पीतल (Brass): Cu + Zn
- कांसा (Bronze): Cu + Sn
- जर्मन सिल्वर (German Silver): Cu + Zn + Ni
15. घनत्व (Density)
संक्रमण तत्वों का घनत्व सामान्यतः अधिक होता है, क्योंकि इनके परमाणु द्रव्यमान अपेक्षाकृत अधिक तथा परमाणु आयतन छोटे होते हैं।
कुछ अनियमितताओं के साथ संक्रमण श्रेणी में घनत्व सामान्यतः बढ़ता है।
16. चुंबकीय गुण (Magnetic Properties)
संक्रमण धातु आयनों का चुंबकीय व्यवहार मुख्य रूप से अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करता है।
प्रतिचुंबकीय पदार्थ (Diamagnetic Substances)
वे पदार्थ जिनमें सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होते हैं, प्रतिचुंबकीय पदार्थ कहलाते हैं।
अनुचुंबकीय पदार्थ (Paramagnetic Substances)
वे पदार्थ जिनमें एक या अधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, अनुचुंबकीय पदार्थ कहलाते हैं।
लौहचुंबकीय पदार्थ (Ferromagnetic Substances)
कुछ पदार्थ चुंबकीय क्षेत्र द्वारा अत्यधिक आकर्षित होते हैं तथा चुंबकत्व को बनाए रख सकते हैं। आयरन, कोबाल्ट तथा निकेल लौहचुंबकीय व्यवहार प्रदर्शित करते हैं।
चुंबकीय आघूर्ण (Magnetic Moment)
केवल चक्रण चुंबकीय आघूर्ण (Spin-Only Magnetic Moment) है:
μ = √[n(n + 2)] BM
जहाँ n अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या है तथा BM का अर्थ बोहर मैग्नेटॉन (Bohr Magneton) है।
17. संकुल निर्माण (Complex Formation)
संक्रमण धातुओं में संकुल यौगिक बनाने की प्रबल प्रवृत्ति होती है।
इसके प्रमुख कारण हैं:
- धातु आयनों का छोटा आकार
- उच्च आवेश घनत्व (High Charge Density)
- उपयुक्त ऊर्जा वाले रिक्त कक्षकों की उपलब्धता
- लिगैंडों (Ligands) से इलेक्ट्रॉन युग्म स्वीकार करने की क्षमता
18. संक्रमण धातु आयनों का रंग
अनेक संक्रमण धातु आयन तथा उनके यौगिक रंगीन होते हैं।
इनका रंग आंशिक रूप से भरे d-कक्षकों से संबंधित इलेक्ट्रॉनिक संक्रमणों के कारण होता है।
d-d संक्रमण (d-d Transition)
किसी संकुल में d-कक्षक अलग-अलग ऊर्जा वाले समूहों में विभाजित हो सकते हैं। दृश्य प्रकाश (Visible Light) के अवशोषण पर एक इलेक्ट्रॉन निम्न ऊर्जा वाले d-कक्षक से उच्च ऊर्जा वाले d-कक्षक में जा सकता है। इसे d-d संक्रमण कहते हैं।

d0 या d10 विन्यास वाले आयन सामान्यतः रंगहीन होते हैं, क्योंकि उनमें d-d संक्रमण संभव नहीं होता है।
- Sc3+: d0 – रंगहीन
- Ti3+: d1 – रंगीन
- V3+: d2 – रंगीन
- Cu2+: d9 – रंगीन
- Zn2+: d10 – रंगहीन
19. आवेश-स्थानांतरण स्पेक्ट्रम (Charge-Transfer Spectrum)
कुछ संक्रमण धातु यौगिक आवेश-स्थानांतरण संक्रमणों (Charge-Transfer Transitions) के कारण गहरे रंग के होते हैं।
ऐसे संक्रमणों में प्रकाश के अवशोषण पर धातु तथा लिगैंड के बीच इलेक्ट्रॉन का स्थानांतरण होता है।
परमैंगनेट आयन, MnO4−, इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
संक्रमण तत्वों के महत्वपूर्ण यौगिक
20. पोटैशियम परमैंगनेट (KMnO4)
पोटैशियम परमैंगनेट मैंगनीज का एक महत्वपूर्ण यौगिक है। इसमें मैंगनीज +7 ऑक्सीकरण अवस्था में उपस्थित होता है।
पोटैशियम परमैंगनेट का निर्माण
पोटैशियम परमैंगनेट को मैंगनीज डाइऑक्साइड (MnO2) से तैयार किया जा सकता है।
MnO2 को किसी ऑक्सीकारक की उपस्थिति में पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड के साथ संगलित (Fused) करने पर पोटैशियम मैंगनेट, K2MnO4, बनता है।
2MnO2 + 4KOH + O2 → 2K2MnO4 + 2H2O
पोटैशियम मैंगनेट हरे रंग का होता है। इसे आगे बैंगनी रंग के पोटैशियम परमैंगनेट में परिवर्तित किया जाता है।

परमैंगनेट आयन की संरचना
परमैंगनेट आयन, MnO4−, की संरचना चतुष्फलकीय (Tetrahedral) होती है। इसमें मैंगनीज +7 ऑक्सीकरण अवस्था में उपस्थित होता है।

KMnO4 के रासायनिक गुण
गर्म करने का प्रभाव
गर्म करने पर पोटैशियम परमैंगनेट अपघटित होता है:
2KMnO4 → K2MnO4 + MnO2 + O2
ऑक्सीकारक क्रिया (Oxidising Action)
KMnO4 एक प्रबल ऑक्सीकारक के रूप में कार्य करता है। इसका अपचयन उत्पाद माध्यम पर निर्भर करता है।
अम्लीय माध्यम में:
MnO4− + 8H+ + 5e− → Mn2+ + 4H2O
अम्लीकृत KMnO4 निम्न पदार्थों का ऑक्सीकरण कर सकता है:
- Fe2+ को Fe3+ में
- SO32− को SO42− में
- I− को I2 में
- ऑक्सालेट आयन को CO2 में
उदासीन या दुर्बल क्षारीय माध्यम में:
MnO4− + 2H2O + 3e− → MnO2 + 4OH−
21. पोटैशियम डाइक्रोमेट (K2Cr2O7)
पोटैशियम डाइक्रोमेट क्रोमियम का एक महत्वपूर्ण यौगिक है। इसमें क्रोमियम +6 ऑक्सीकरण अवस्था में उपस्थित होता है।
क्रोमाइट अयस्क से निर्माण
पोटैशियम डाइक्रोमेट को क्रोमाइट अयस्क, FeCr2O4, से तैयार किया जाता है।
क्रोमाइट अयस्क को वायु या ऑक्सीजन की उपस्थिति में सोडियम कार्बोनेट के साथ संगलित करने पर सोडियम क्रोमेट बनता है।
4FeCr2O4 + 8Na2CO3 + 7O2 → 8Na2CrO4 + 2Fe2O3 + 8CO2
सोडियम क्रोमेट पीले रंग का होता है।
अम्लीकरण करने पर सोडियम क्रोमेट, सोडियम डाइक्रोमेट में परिवर्तित हो जाता है।
2Na2CrO4 + H2SO4 → Na2Cr2O7 + Na2SO4 + H2O
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