Chapter 10
Biotechnology and Its Applications
Preview Biotechnology and Its Applications for Biology in JAC 12th (SCI.).
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जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) के विभिन्न अनुप्रयोग हैं। इसके कुछ महत्वपूर्ण अनुप्रयोगों में चिकित्सीय उपयोग (Therapeutics), निदान (Diagnostics), कृषि के लिए आनुवंशिक रूप से रूपांतरित फसलें, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, जैव उपचार (Bioremediation), अपशिष्ट उपचार और ऊर्जा उत्पादन शामिल हैं।
कृषि और चिकित्सा में जैव प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग
जैव प्रौद्योगिकी के तीन महत्वपूर्ण अनुसंधान क्षेत्र हैं:
- उन्नत जीव, सामान्यतः किसी सूक्ष्मजीव या शुद्ध एंजाइम के रूप में सर्वोत्तम उत्प्रेरक (Catalyst) उपलब्ध कराना।
- उत्प्रेरक के कार्य करने के लिए अभियांत्रिकी द्वारा अनुकूल परिस्थितियाँ तैयार करना।
- प्रोटीन या कार्बनिक यौगिक के शुद्धिकरण के लिए डाउनस्ट्रीम प्रोसेसिंग (Downstream Processing) तकनीकों का विकास करना।
कृषि में जैव प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग
जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग करके निम्नलिखित तरीकों से खाद्य उत्पादन बढ़ाया जा सकता है:
- कृषि-रसायन आधारित कृषि (Agrochemical-Based Agriculture)
- जैविक कृषि (Organic Agriculture)
- आनुवंशिक रूप से अभियांत्रित फसल आधारित कृषि (Genetically Engineered Crop-Based Agriculture)
हरित क्रांति (Green Revolution)
हरित क्रांति मुख्य रूप से निम्नलिखित कारणों से खाद्य आपूर्ति बढ़ाने में सफल रही:
- उन्नत फसल किस्मों का उपयोग
- उर्वरकों और कीटनाशकों जैसे कृषि-रसायनों का उपयोग
- बेहतर प्रबंधन पद्धतियों का उपयोग
विकासशील देशों के किसानों के लिए कृषि-रसायन महंगे होते हैं और इनका पर्यावरण पर हानिकारक प्रभाव भी पड़ सकता है। इसलिए एक वैकल्पिक उपाय के रूप में आनुवंशिक रूप से रूपांतरित फसलों (GM Crops) का विकास किया गया।
आनुवंशिक रूप से रूपांतरित जीव (Genetically Modified Organisms – GMOs)
ऐसे पौधे, जीवाणु, कवक और जंतु जिनके जीनों में कृत्रिम रूप से परिवर्तन किया गया हो, आनुवंशिक रूप से रूपांतरित जीव (GMOs) कहलाते हैं।
इन्हें ट्रांसजेनिक जीव (Transgenic Organisms) भी कहा जाता है। इनमें एक या अधिक बाहरी जीन उपस्थित होते हैं और अभिव्यक्त होते हैं, जिन्हें ट्रांसजीन (Transgenes) कहा जाता है।
आनुवंशिक रूप से रूपांतरित फसलों के लाभ
फसलों का आनुवंशिक रूपांतरण निम्नलिखित प्रकार से उपयोगी हो सकता है:
- ठंड, सूखा, लवणता और गर्मी जैसे अजैविक तनावों (Abiotic Stresses) के प्रति सहनशीलता बढ़ाना।
- कीट-प्रतिरोधी फसलों द्वारा रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम करना।
- कटाई के बाद होने वाली हानि (Post-Harvest Losses) को कम करना।
- पौधों द्वारा खनिजों के उपयोग की क्षमता बढ़ाना, जिससे मिट्टी की उर्वरता जल्दी समाप्त होने से बचती है।
- भोजन के पोषण मूल्य को बढ़ाना। उदाहरण के लिए, गोल्डन राइस (Golden Rice) विटामिन A से समृद्ध होता है।
- स्टार्च, ईंधन और औषधियों के रूप में उद्योगों के लिए वैकल्पिक संसाधन उपलब्ध कराने हेतु विशेष रूप से तैयार पौधों का उत्पादन करना।
जैव कीटनाशक (Biopesticides)
कृषि में जैव प्रौद्योगिकी का एक महत्वपूर्ण अनुप्रयोग कीट-प्रतिरोधी पौधों का उत्पादन है। ऐसे पौधे उपयोग किए जाने वाले कीटनाशकों की मात्रा को कम करने में सहायता कर सकते हैं।
Bt कपास (Bt Cotton)
Bacillus thuringiensis की कुछ स्ट्रेन अपनी वृद्धि की एक विशेष अवस्था के दौरान प्रोटीन क्रिस्टल बनाती हैं।
इन क्रिस्टलों में विषैला कीटनाशी प्रोटीन होता है, जो लेपिडोप्टेरन्स (Lepidopterans), कोलियोप्टेरन्स (Coleopterans) और डिप्टेरन्स (Dipterans) जैसे कुछ कीटों को मारता है।
यह विष Bacillus thuringiensis को स्वयं नहीं मारता, क्योंकि Bt टॉक्सिन प्रोटीन निष्क्रिय प्रोटॉक्सिन (Inactive Protoxin) के रूप में मौजूद होता है। जब कोई कीट इस निष्क्रिय विष को ग्रहण करता है, तो कीट की आंत के क्षारीय pH के कारण क्रिस्टल घुल जाते हैं और विष सक्रिय रूप में परिवर्तित हो जाता है।
सक्रिय विष मध्यांत्र (Midgut) की उपकला कोशिकाओं की सतह से जुड़कर उनमें छिद्र बनाता है। इससे कोशिकाएँ फूलती हैं और उनका लयन (Lysis) होता है, जिसके परिणामस्वरूप अंततः कीट की मृत्यु हो जाती है।
इस विष को cry नामक जीन द्वारा कोड किया जाता है।
महत्वपूर्ण cry जीन
- cryIAc और cryIIAb कपास के बॉलवर्म (Cotton Bollworms) को नियंत्रित करने में सहायता करते हैं।
- cryIAb कॉर्न बोरर (Corn Borer) को नियंत्रित करने में सहायता करता है।
- cryIIIB कोलोराडो पोटैटो बीटल (Colorado Potato Beetle) को नियंत्रित करने में सहायता करता है।
फसल और लक्षित कीट के अनुसार Bacillus thuringiensis से विशिष्ट Bt टॉक्सिन जीनों को अलग करके फसली पौधों में प्रवेश कराया जाता है।
कीट-प्रतिरोधी पौधे और RNA हस्तक्षेप (RNA Interference – RNAi)
Meloidogyne incognita नामक निमेटोड तंबाकू के पौधों की जड़ों को संक्रमित करता है और तंबाकू के उत्पादन में कमी लाता है।
RNA हस्तक्षेप (RNAi) का उपयोग करके इस संक्रमण को रोका जा सकता है।
RNA हस्तक्षेप वह प्रक्रिया है, जिसमें पूरक द्विरज्जुकी RNA (Double-Stranded RNA – dsRNA) के कारण किसी विशिष्ट mRNA को निष्क्रिय कर दिया जाता है।
dsRNA, mRNA से जुड़ता है और उसके अनुवादन (Translation) को रोक देता है, जिसके परिणामस्वरूप mRNA निष्क्रिय हो जाता है।
Agrobacterium वेक्टर का उपयोग करके निमेटोड-विशिष्ट जीनों को पोषक पौधे में प्रवेश कराया जाता है। ये जीन पोषक कोशिकाओं में सेंस (Sense) और एंटीसेंस (Antisense) दोनों प्रकार के RNA बनाते हैं।
दोनों RNA एक-दूसरे के पूरक होते हैं और द्विरज्जुकी RNA (dsRNA) बनाते हैं। इससे RNA हस्तक्षेप शुरू होता है और निमेटोड का विशिष्ट mRNA निष्क्रिय हो जाता है।
इसके परिणामस्वरूप परजीवी ट्रांसजेनिक पोषक में जीवित नहीं रह पाता और पौधा कीट से सुरक्षित रहता है।
चिकित्सा में जैव प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग
सुरक्षित और प्रभावी चिकित्सीय औषधियों (Therapeutic Drugs) के उत्पादन के लिए पुनः संयोजक DNA तकनीक (Recombinant DNA Technology) का उपयोग किया जाता है।
ये पुनः संयोजक चिकित्सीय उत्पाद सामान्यतः उन अवांछित प्रतिरक्षात्मक प्रतिक्रियाओं को उत्पन्न नहीं करते, जो गैर-मानव स्रोतों से प्राप्त समान उत्पादों में देखी जाती हैं।
मानव उपयोग के लिए कई पुनः संयोजक चिकित्सीय उत्पादों को स्वीकृति दी गई है और इनमें से कुछ भारत में भी उपलब्ध हैं।
आनुवंशिक रूप से अभियांत्रित इंसुलिन (Genetically Engineered Insulin)
इंसुलिन में दो छोटी पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाएँ होती हैं:
- श्रृंखला A (Chain A)
- श्रृंखला B (Chain B)
ये दोनों श्रृंखलाएँ डाइसल्फाइड बंधों (Disulphide Bridges) द्वारा आपस में जुड़ी होती हैं।
स्तनधारियों में इंसुलिन का संश्लेषण एक प्रोहार्मोन (Prohormone) के रूप में होता है। परिपक्व और क्रियाशील बनने से पहले इसका प्रसंस्करण आवश्यक होता है।
इस प्रोहार्मोन में एक अतिरिक्त भाग होता है, जिसे C-पेप्टाइड (C-Peptide) कहा जाता है।
परिपक्व इंसुलिन में C-पेप्टाइड उपस्थित नहीं होता और इंसुलिन के परिपक्व होने के दौरान इसे हटा दिया जाता है।
पहले इंसुलिन को वध किए गए मवेशियों और सूअरों के अग्न्याशय से निकाला जाता था। हालांकि, कुछ रोगियों में इस इंसुलिन से एलर्जी उत्पन्न हो जाती थी।
पुनः संयोजक DNA तकनीक द्वारा मानव इंसुलिन का उत्पादन
1983 में अमेरिकी कंपनी Eli Lilly ने मानव इंसुलिन की A और B श्रृंखलाओं के अनुरूप दो DNA अनुक्रम तैयार किए और उत्पादन के लिए उन्हें Escherichia coli के प्लास्मिड में प्रवेश कराया।
A और B श्रृंखलाओं का अलग-अलग उत्पादन किया गया, फिर उन्हें निकालकर डाइसल्फाइड बंध बनाते हुए आपस में जोड़ा गया। इस प्रकार बने मानव इंसुलिन को Humulin कहा गया।
पुनः संयोजक वैक्सीन (Recombinant Vaccines)
आनुवंशिक अभियांत्रिकी विधियों द्वारा तैयार की गई वैक्सीन को पुनः संयोजक वैक्सीन या द्वितीय पीढ़ी की वैक्सीन (Second-Generation Vaccines) कहा जाता है।
PDF में Recombinant Hepatitis-B Vaccine और Polio Vaccine को पुनः संयोजक DNA वैक्सीन के उदाहरण के रूप में दिया गया है।
स्टेम सेल तकनीक (Stem Cell Technology)
स्टेम कोशिकाओं का उपयोग करके घातक (Malignant) और अघातक (Non-Malignant) रोगों के उपचार के लिए स्टेम सेल तकनीक का उपयोग किया जाता है।
स्टेम कोशिकाएँ अविभेदित जैविक कोशिकाएँ (Undifferentiated Biological Cells) होती हैं। ये विशिष्ट कोशिकाओं में विभेदित हो सकती हैं और विभाजित होकर अधिक स्टेम कोशिकाएँ बना सकती हैं।
स्टेम कोशिकाओं के प्रकार
- भ्रूणीय स्टेम कोशिकाएँ (Embryonic Stem Cells): इन्हें ब्लास्टोसिस्ट (Blastocyst) के आंतरिक कोशिका समूह से अलग किया जाता है।
- वयस्क स्टेम कोशिकाएँ (Adult Stem Cells): ये भ्रूणीय विकास के बाद पूरे शरीर में मौजूद रहती हैं और विभिन्न प्रकार के ऊतकों में पाई जाती हैं।
वयस्क स्टेम कोशिकाओं का उपयोग चिकित्सीय उपचारों में किया जाता है, उदाहरण के लिए अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण (Bone Marrow Transplantation)।
जन्म के तुरंत बाद गर्भनाल रक्त (Umbilical Cord Blood) से भी स्टेम कोशिकाएँ प्राप्त की जा सकती हैं।
जीन थेरेपी (Gene Therapy)
जीन थेरेपी उन विधियों का समूह है, जिनकी सहायता से किसी बच्चे या भ्रूण में पहचाने गए जीन दोष (Gene Defect) को ठीक किया जा सकता है।
इस विधि में दोषपूर्ण या अक्रियाशील जीन को बदलने या उसकी कमी की पूर्ति करने के लिए व्यक्ति में सामान्य जीन प्रवेश कराए जाते हैं।
ADA की कमी के लिए जीन थेरेपी
पहली क्लिनिकल जीन थेरेपी का प्रयास 1990 में Adenosine Deaminase (ADA) की कमी से पीड़ित चार वर्षीय लड़की पर किया गया था।
ADA की कमी एडेनोसिन डीएमिनेज के लिए उत्तरदायी जीन के विलोपन (Deletion) के कारण होती है।
कुछ मामलों में इसका उपचार अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण (Bone Marrow Transplantation) और एंजाइम प्रतिस्थापन थेरेपी (Enzyme Replacement Therapy) द्वारा किया जा सकता है, लेकिन ये उपचार पूरी तरह रोगमुक्त नहीं करते हैं।
ADA की कमी के लिए जीन थेरेपी के चरण
- रोगी के रक्त से लिम्फोसाइट्स (Lymphocytes) लेकर उनका संवर्धन किया जाता है।
- रेट्रोवायरल वेक्टर (Retroviral Vector) की सहायता से इन लिम्फोसाइट्स में क्रियाशील ADA cDNA प्रवेश कराया जाता है।
- आनुवंशिक रूप से अभियांत्रित लिम्फोसाइट्स को वापस रोगी के शरीर में प्रवेश कराया जाता है।
- इन कोशिकाओं के अमर (Immortal) न होने के कारण इस प्रक्रिया को बार-बार दोहराना पड़ता है।
स्थायी उपचार के लिए अस्थि मज्जा कोशिकाओं से अलग किए गए क्रियाशील ADA जीन को भ्रूणीय विकास की प्रारंभिक अवस्था में कोशिकाओं में प्रवेश कराया जा सकता है।
PDF में जीन थेरेपी के संदर्भ में Cystic Fibrosis, Haemophilia और Cancer जैसे रोगों का भी उल्लेख किया गया है।
आणविक निदान (Molecular Diagnosis)
पारंपरिक निदान विधियों द्वारा किसी रोग का प्रारंभिक अवस्था में पता लगाना अक्सर संभव नहीं होता। जैव प्रौद्योगिकी ऐसी तकनीकें उपलब्ध कराती है, जो रोग के प्रारंभिक निदान में सहायता कर सकती हैं।
PDF में बताई गई महत्वपूर्ण तकनीकें हैं:
- Polymerase Chain Reaction (PCR)
- Recombinant DNA Technology
- Enzyme-Linked Immunosorbent Assay (ELISA)
Polymerase Chain Reaction (PCR)
जब शरीर में किसी रोगजनक की सांद्रता बहुत कम होती है, तब पारंपरिक विधियों द्वारा उसका पता लगाना संभव नहीं हो सकता।
PCR रोगजनक, जीवाणु या वायरस के न्यूक्लिक अम्ल (Nucleic Acid) का प्रवर्धन करता है, जिससे उसका पता लगाना संभव हो जाता है।
PCR का उपयोग संदिग्ध AIDS रोगियों में HIV तथा संदिग्ध कैंसर रोगियों में आनुवंशिक उत्परिवर्तन (Genetic Mutations) का पता लगाने के लिए किया जाता है।
निदान में पुनः संयोजक DNA तकनीक
रेडियोधर्मी अणु (Radioactive Molecule) से चिह्नित एकल-रज्जुकी DNA या RNA को प्रोब (Probe) कहा जाता है।
प्रोब को कोशिकाओं के क्लोन में उपस्थित उसके पूरक DNA के साथ संकरण (Hybridisation) करने दिया जाता है।
इसके बाद कोशिकाओं का पता ऑटोरेडियोग्राफी (Autoradiography) द्वारा लगाया जाता है।
उत्परिवर्तित जीन वाला क्लोन फोटोग्राफिक फिल्म पर दिखाई नहीं देता, क्योंकि प्रोब की उत्परिवर्तित जीन के साथ पूरकता नहीं होती है।
Enzyme-Linked Immunosorbent Assay (ELISA)
ELISA प्रतिजन-प्रतिरक्षी पारस्परिक क्रिया (Antigen-Antibody Interaction) के सिद्धांत पर आधारित है।
इसका उपयोग निम्नलिखित का पता लगाने के लिए किया जा सकता है:
- प्रोटीन और ग्लाइकोप्रोटीन जैसे प्रतिजनों (Antigens) की उपस्थिति।
- रोगजनकों के विरुद्ध बनने वाली एंटीबॉडी (Antibodies)।
ट्रांसजेनिक जंतु (Transgenic Animals)
ऐसे जंतु जिनके DNA में परिवर्तन करके उनमें किसी अतिरिक्त या बाहरी जीन को उपस्थित और अभिव्यक्त कराया जाता है, ट्रांसजेनिक जंतु कहलाते हैं।
PDF में ट्रांसजेनिक चूहे, खरगोश, सूअर, भेड़ और गाय को उदाहरण के रूप में दिया गया है।
ट्रांसजेनिक जंतुओं के उपयोग
1. सामान्य शरीर क्रिया और विकास का अध्ययन
ट्रांसजेनिक जंतु जीन नियमन (Gene Regulation) तथा शरीर के सामान्य कार्यों और विकास पर इसके प्रभावों का अध्ययन करने में उपयोगी होते हैं।
उदाहरण के लिए, इनका उपयोग इंसुलिन-समान वृद्धि कारकों (Insulin-Like Growth Factors) जैसे जटिल वृद्धि कारकों का अध्ययन करने के लिए किया जा सकता है।
2. रोगों का अध्ययन
मानव रोगों के लिए उत्तरदायी जीनों को समझने और संभावित उपचारों का अध्ययन करने के लिए ट्रांसजेनिक जंतुओं को विकसित किया जा सकता है।
PDF में निम्नलिखित रोगों का उल्लेख किया गया है:
- Cancer
- Cystic Fibrosis
- Rheumatoid Arthritis
- Alzheimer's Disease
3. जैविक उत्पाद (Biological Products)
किसी विशेष उत्पाद के लिए उत्तरदायी DNA के भाग या जीन को ट्रांसजेनिक जंतुओं में प्रवेश कराकर उपयोगी जैविक उत्पाद बनाए जा सकते हैं।
उदाहरण के लिए, मानव प्रोटीन Alpha-1-Antitrypsin का उपयोग Emphysema के उपचार में किया जाता है।
1997 में पहली ट्रांसजेनिक गाय Rosie ने मानव प्रोटीन से समृद्ध दूध का उत्पादन किया, जिसमें मानव Alpha-Lactalbumin उपस्थित था।
4. वैक्सीन सुरक्षा (Vaccine Safety)
मनुष्यों पर वैक्सीन का उपयोग करने से पहले उसकी सुरक्षा का परीक्षण करने के लिए ट्रांसजेनिक चूहों को विकसित किया जा सकता है।
PDF में Polio Vaccine को उदाहरण के रूप में दिया गया है।
5. रासायनिक सुरक्षा परीक्षण (Chemical Safety Testing)
रासायनिक सुरक्षा परीक्षण को विषाक्तता या सुरक्षा परीक्षण (Toxicity or Safety Testing) भी कहा जाता है।
ट्रांसजेनिक जंतुओं को गैर-ट्रांसजेनिक जंतुओं की तुलना में विषैले पदार्थों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाया जा सकता है। इसके बाद उन्हें विषैले पदार्थों के संपर्क में लाकर उनके प्रभावों का अध्ययन किया जाता है।
इससे कम समय में सुरक्षा या विषाक्तता से संबंधित परिणाम प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
नैतिक मुद्दे (Ethical Issues)
आनुवंशिक रूप से रूपांतरित जीवों को पारिस्थितिकी तंत्र में छोड़े जाने पर उनके अप्रत्याशित परिणाम हो सकते हैं।
इसलिए जैविक गतिविधियों और आनुवंशिक रूप से रूपांतरित जीवों के मूल्यांकन के लिए नैतिक मानकों और नियमों की आवश्यकता होती है।
GEAC
PDF में GM अनुसंधान की वैधता और सार्वजनिक उपयोग के लिए आनुवंशिक रूप से रूपांतरित जीवों को प्रस्तुत करने की सुरक्षा से संबंधित निर्णयों के संदर्भ में Genetic Engineering Approval Committee (GEAC) का उल्लेख किया गया है।
पेटेंट (Patent)
पेटेंट किसी आविष्कार को सार्वजनिक रूप से प्रकट करने के बदले राज्य द्वारा आविष्कारक या उसके अधिकार प्राप्त व्यक्ति को सीमित अवधि के लिए दिए गए विशेष अधिकारों का समूह है।
PDF में पेटेंट से संबंधित तीन मापदंड दिए गए हैं:
- नवीनता (Novelty)
- गैर-स्पष्टता (Non-Obviousness)
- उपयोगिता (Utility)
बायोपाइरेसी (Biopiracy)
PDF में बायोपाइरेसी को बहुराष्ट्रीय कंपनियों और अन्य संगठनों द्वारा संबंधित देशों और लोगों की उचित अनुमति के बिना तथा उन्हें क्षतिपूर्ति भुगतान किए बिना जैव संसाधनों (Bioresources) के उपयोग के रूप में बताया गया है।
विकासशील देश जैव विविधता और पारंपरिक ज्ञान (Traditional Knowledge) से समृद्ध हैं। जैव संसाधनों से संबंधित पारंपरिक ज्ञान का उपयोग आधुनिक अनुप्रयोगों के विकास में किया जा सकता है और यह व्यावसायिक रूप से मूल्यवान हो सकता है।
इसलिए जैव संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान के अनधिकृत उपयोग को रोकने के लिए कानूनों की आवश्यकता है।
बासमती चावल (Basmati Rice)
PDF में पेटेंट और बायोपाइरेसी के संदर्भ में बासमती चावल का उदाहरण दिया गया है। इसमें बासमती चावल से संबंधित एक अमेरिकी कंपनी द्वारा प्राप्त पेटेंट का उल्लेख है और बताया गया है कि बासमती की किस्मों की खेती पारंपरिक रूप से भारतीय किसानों द्वारा की जाती रही है।
हल्दी और नीम (Turmeric and Neem)
PDF में हल्दी और नीम से जुड़े पेटेंट के उदाहरणों की भी चर्चा की गई है।
इसमें घाव भरने में हल्दी के उपयोग से संबंधित 1995 के एक अमेरिकी पेटेंट और नीम के तेल के कवकनाशी (Fungicidal) उपयोग से संबंधित एक अन्य पेटेंट का उल्लेख किया गया है।
ये उदाहरण पारंपरिक ज्ञान और जैव संसाधनों को अनुचित पेटेंट दावों से सुरक्षित रखने के महत्व को दर्शाते हैं।
परीक्षा के लिए त्वरित पुनरावृत्ति
- GM फसलों का अर्थ और उनके लाभ अच्छी तरह समझें।
- Bt टॉक्सिन की क्रियाविधि और महत्वपूर्ण cry जीनों को दोहराएँ।
- RNA हस्तक्षेप (RNAi) और Meloidogyne incognita के उदाहरण को समझें।
- मानव इंसुलिन की संरचना और उसके पुनः संयोजक उत्पादन को याद रखें।
- ADA की कमी और जीन थेरेपी के मूल चरणों को दोहराएँ।
- PCR और ELISA के सिद्धांत एवं उपयोग जानें।
- ट्रांसजेनिक जंतुओं के प्रमुख उपयोग याद रखें।
- पेटेंट, बायोपाइरेसी तथा बासमती चावल, हल्दी और नीम के उदाहरणों को समझें।
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