Chapter 1
Sexual Reproduction in Flowering Plants
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Notes
पुष्पीय पौधों में लैंगिक जनन
1. परिचय
आवृतबीजी पौधों (Angiosperms) में लैंगिक जनन का कार्य फूल करते हैं। फूल वास्तव में पौधे के रूपांतरित और संक्षिप्त प्ररोह (Modified Condensed Shoots) होते हैं।
एक सामान्य फूल में पुष्पीय पत्तियों के चार चक्र पाए जाते हैं:
- बाह्यदल (Sepals/Calyx)
- दल या पंखुड़ियाँ (Petals/Corolla)
- पुंकेसर (Stamens/Androecium) – नर जनन भाग
- अंडप (Carpels/Gynoecium) – मादा जनन भाग
बाह्यदल और दल मिलकर फूल का बाहरी आवरण बनाते हैं, जबकि पुंकेसर और अंडप जनन से जुड़े मुख्य भाग होते हैं।
2. निषेचन-पूर्व संरचनाएँ एवं घटनाएँ
निषेचन होने से पहले फूल में नर और मादा जनन संरचनाओं का निर्माण तथा विकास होता है। इन्हें निषेचन-पूर्व (Pre-Fertilisation) संरचनाएँ एवं घटनाएँ कहा जाता है।
3. नर जनन अंग – पुंकेसर
पुंकेसर (Stamen) आवृतबीजी फूल का नर जनन अंग होता है।
इसके मुख्य रूप से दो भाग होते हैं:
- पुंतंतु (Filament) – एक लंबा और पतला डंठल।
- परागकोष (Anther) – दो पालियों वाली संरचना।
अलग-अलग फूलों में पुंकेसर की लंबाई अलग-अलग हो सकती है। पुंतंतु का निचला सिरा पुष्पासन (Thalamus) या फूल की पंखुड़ी से जुड़ा होता है।
परागकोष सामान्यतः दो पालियों वाला होता है। प्रत्येक पाली में दो थीका (Theca) होते हैं, इसलिए इसे द्विथीकी (Dithecous) कहा जाता है।
परागकोष चार भागों वाला या चतुष्कोणीय होता है। इसके चारों कोनों पर चार लघुबीजाणुधानियाँ (Microsporangia) होती हैं, यानी प्रत्येक पाली में दो लघुबीजाणुधानियाँ पाई जाती हैं।
4. लघुबीजाणुधानी की संरचना
लघुबीजाणुधानी (Microsporangium) आगे चलकर परागकोष्ठ (Pollen Sac) के रूप में विकसित होती है। यह परागकोष की लंबाई में फैली रहती है।
लघुबीजाणुधानी लगभग गोल दिखाई देती है और इसकी भित्ति चार परतों से बनी होती है:
- एपिडर्मिस (Epidermis)
- एंडोथीसियम (Endothecium)
- मध्य परतें (Middle Layers)
- टेपेटम (Tapetum)
एपिडर्मिस (Epidermis)
- यह एक कोशिका मोटी परत होती है।
- इसका मुख्य कार्य सुरक्षा प्रदान करना है।
एंडोथीसियम (Endothecium)
- यह एक परत वाली संरचना होती है।
- इसकी कोशिकाओं में रेशेदार मोटाई (Fibrous Thickening) पाई जाती है।
- परिपक्व होने पर यह परागकोष के खुलने (Anther Dehiscence) में सहायता करती है।
मध्य परतें (Middle Layers)
- सामान्यतः 1–5 मध्य परतें पाई जाती हैं।
- परागकोष के परिपक्व होने के दौरान ये नष्ट हो जाती हैं।
टेपेटम (Tapetum)
- टेपेटम की कोशिकाएँ पोषण देने का कार्य करती हैं।
- ये विकसित हो रहे परागकणों को पोषण प्रदान करती हैं।
- इन कोशिकाओं में सघन कोशिकाद्रव्य (Dense Cytoplasm) पाया जाता है।
- इनमें सामान्यतः एक से अधिक केंद्रक पाए जाते हैं।
जब परागकोष युवा अवस्था में होता है, तब प्रत्येक लघुबीजाणुधानी के केंद्र में सघन रूप से व्यवस्थित समान कोशिकाओं का एक समूह पाया जाता है। इसे बीजाणुजन ऊतक (Sporogenous Tissue) कहते हैं।
5. लघुबीजाणुजनन (Microsporogenesis)
बीजाणुजन ऊतक की कोशिकाएँ अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) करती हैं और लघुबीजाणु चतुष्क (Microspore Tetrads) बनाती हैं।
बीजाणुजन ऊतक की प्रत्येक वह कोशिका जो लघुबीजाणु चतुष्क बनाने में सक्षम होती है, उसे पराग मातृ कोशिका (Pollen Mother Cell – PMC) या लघुबीजाणु मातृ कोशिका (Microspore Mother Cell) कहते हैं।
पराग मातृ कोशिका से अर्धसूत्री विभाजन द्वारा लघुबीजाणुओं के बनने की प्रक्रिया को लघुबीजाणुजनन (Microsporogenesis) कहा जाता है।
जैसे-जैसे परागकोष परिपक्व होकर सूखता है, लघुबीजाणु एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं और परागकणों में विकसित हो जाते हैं।
प्रत्येक लघुबीजाणुधानी में कई हजार लघुबीजाणु या परागकण बन सकते हैं।
6. परागकण (Pollen Grain)
जब लघुबीजाणु चतुष्क अलग होता है, तो प्रत्येक लघुबीजाणु को परागकण (Pollen Grain) कहा जाता है।
- परागकण नर युग्मकोद्भिद (Male Gametophyte) का प्रतिनिधित्व करता है।
- यह सामान्यतः गोलाकार होता है।
- इसका व्यास लगभग 25–50 माइक्रोमीटर होता है।
परागकण की भित्ति दो परतों से बनी होती है:
- एक्साइन (Exine) – कठोर बाहरी परत
- इंटाइन (Intine) – भीतरी परत
एक्साइन की विशेषताएँ
- एक्साइन स्पोरोपोलेनिन (Sporopollenin) से बनी होती है।
- स्पोरोपोलेनिन के कारण यह अधिक तापमान, प्रबल अम्ल और क्षार को सहन कर सकती है।
- इसमें कुछ स्थानों पर स्पोरोपोलेनिन नहीं होता। इन स्थानों को अंकुरण छिद्र (Germ Pores) कहा जाता है।
- एक्साइन पर अलग-अलग प्रकार के पैटर्न और आकृतियाँ पाई जाती हैं।
इंटाइन की विशेषताएँ
- यह एक पतली परत होती है।
- यह सेल्यूलोज और पेक्टिन से बनी होती है।
परागकणों के अध्ययन को पैलिनोलॉजी (Palynology) कहा जाता है।
7. लघुबीजाणु से परागकण का विकास
जब लघुबीजाणु परिपक्व होना शुरू करता है, तब उसके कोशिकाद्रव्य में एक रिक्तिका (Vacuole) बनती है और एक असममित स्पिंडल बनता है।
लघुबीजाणु के अंकुरण के दौरान केंद्रक किनारे की ओर चला जाता है। समसूत्री विभाजन (Mitosis) के बाद दो असमान कोशिकाएँ बनती हैं:
- कायिक कोशिका (Vegetative Cell) – बड़ी कोशिका
- जनन कोशिका (Generative Cell) – छोटी कोशिका
इस अवस्था को लघुबीजाणु की द्विकोशिकीय अवस्था (2-Celled Stage) कहा जाता है।
यह विभाजन असममित समसूत्री विभाजन (Asymmetric Mitosis) कहलाता है।
लगभग 60% आवृतबीजी पौधों में परागकण द्विकोशिकीय अवस्था में ही मुक्त होते हैं। परागनलिका के बीजांड तक पहुँचने की प्रक्रिया के दौरान नर युग्मक बनते हैं।
कुछ प्रजातियों में परागकण के मुक्त होने से पहले ही जनन केंद्रक समसूत्री विभाजन करके दो नर युग्मक बना देता है। इसे त्रिकोशिकीय अवस्था (3-Celled Stage) कहा जाता है।
8. पराग एलर्जी (Pollen Allergy)
जब शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली किसी पदार्थ के प्रति आवश्यकता से अधिक संवेदनशील प्रतिक्रिया देती है, तो इसे एलर्जी कहा जाता है।
यदि किसी व्यक्ति की प्रतिरक्षा प्रणाली परागकणों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो, तो इसे पराग एलर्जी (Pollen Allergy) कहते हैं।
उदाहरण: पार्थेनियम (Parthenium) पराग एलर्जी का कारण बन सकता है।
9. परागकणों के उपयोग
- परागकणों का उपयोग खाद्य पूरक (Food Supplements) के रूप में किया जा सकता है।
- इनका उपयोग टैबलेट और सिरप बनाने में किया जाता है।
- इनका उपयोग खिलाड़ियों और रेस के घोड़ों के प्रदर्शन को बढ़ाने के लिए भी किया जाता है।
10. परागकण की जीवनक्षमता (Pollen Grain Viability)
परागकण जिस समय तक जीवित और क्रियाशील रहकर नर युग्मक बनाने तथा मादा युग्मक के साथ संलयन करने में सक्षम रहता है, वह उसकी जीवनक्षमता (Viability) से संबंधित है।
- परागकण की जीवनक्षमता तापमान और आर्द्रता पर निर्भर करती है।
- अलग-अलग प्रजातियों में इसकी अवधि अलग-अलग होती है।
ध्यान दें: चावल और गेहूँ के परागकण लगभग 30 मिनट में अपनी जीवनक्षमता खो देते हैं, जबकि Rosaceae, Leguminosae और Solanaceae कुल के सदस्यों में परागकण कई महीनों तक जीवित रह सकते हैं।
11. पराग बैंक (Pollen Banks)
पराग बैंक वह स्थान है जहाँ परागकणों को सुरक्षित रखा जाता है।
- संग्रहित परागकणों का उपयोग भविष्य में निषेचन कार्यक्रमों में किया जा सकता है।
- क्रायोप्रिजर्वेशन (Cryopreservation) की सहायता से परागकणों की जीवनक्षमता लंबे समय तक बनाए रखी जा सकती है।
12. क्रायोप्रिजर्वेशन (Cryopreservation)
क्रायोप्रिजर्वेशन ऐसी प्रक्रिया है जिसमें जैविक पदार्थों को बहुत कम तापमान पर कई वर्षों तक सुरक्षित रखा जाता है।
इसके लिए मुख्य रूप से लगभग −196°C तापमान पर तरल नाइट्रोजन (Liquid Nitrogen) का उपयोग किया जाता है।
13. मादा जनन अंग – स्त्रीकेसर/अंडप
फूल के मादा जनन अंग को स्त्रीकेसर या अंडप (Pistil/Carpel) कहा जाता है।
इसके तीन मुख्य भाग होते हैं:
- वर्तिकाग्र (Stigma)
- वर्तिका (Style)
- अंडाशय (Ovary)
वर्तिकाग्र (Stigma)
वर्तिकाग्र स्त्रीकेसर का ऊपरी भाग होता है, जहाँ परागकण आकर गिरते हैं।
वर्तिका (Style)
वर्तिका एक लंबा और पतला भाग है, जो वर्तिकाग्र के नीचे तथा अंडाशय के ऊपर स्थित होता है।
अंडाशय (Ovary)
अंडाशय स्त्रीकेसर का नीचे स्थित फूला हुआ भाग होता है।
बीजांड (Ovule)
बीजांड अंडाशय के अंदर पाए जाते हैं।
बीजांड में अध्यावरण (Integuments) की दो परतें होती हैं:
- भीतरी अध्यावरण (Inner Integument)
- बाहरी अध्यावरण (Outer Integument)
अंडाशय के अंदर अंडाशयी गुहा (Ovarian Cavity) होती है। इसमें प्लेसेंटा (Placenta) पाया जाता है, जो लोक्यूल (Locule) और बीजांड को जोड़ता है।
Ovary → Locule → Placenta → Ovule
14. बीजांड की संरचना
न्यूसेलस (Nucellus)
बीजांड के अंदर उपस्थित कोशिकाओं के समूह को न्यूसेलस कहा जाता है।
फ्यूनिकल (Funicle)
बीजांड फ्यूनिकल द्वारा प्लेसेंटा से जुड़ा होता है।
हाइलम (Hilum)
बीजांड और फ्यूनिकल के मिलने वाले स्थान को हाइलम कहते हैं।
माइक्रोपाइल (Micropyle)
अध्यावरण पूरे बीजांड को ढकते हैं, लेकिन एक छोटा-सा छिद्र खुला रहता है। इसे माइक्रोपाइल कहते हैं।
चालाजा (Chalaza)
माइक्रोपाइल के विपरीत दिशा में स्थित बीजांड के आधार भाग को चालाजा कहा जाता है।
महाबीजाणु मातृ कोशिका (Megaspore Mother Cell)
वह विशेष कोशिका जो अर्धसूत्री विभाजन करके चार महाबीजाणु (Megaspores) बनाती है, उसे महाबीजाणु मातृ कोशिका (MMC) कहते हैं।
यह प्रकृति में द्विगुणित (2n) होती है।
चार महाबीजाणुओं में से तीन नष्ट हो जाते हैं और केवल एक क्रियाशील रहता है। यही क्रियाशील महाबीजाणु आगे विकसित होता है।
15. मेगागैमेटोजेनेसिस (Megagametogenesis)
एकबीजाणुक विकास (Monosporic Development)
क्रियाशील महाबीजाणु आकार में बढ़कर भ्रूणकोष (Embryo Sac) में विकसित होता है। इस प्रकार के विकास को एकबीजाणुक विकास (Monosporic Development) कहते हैं।
महाबीजाणु समसूत्री विभाजनों द्वारा भ्रूणकोष बनाता है। केंद्रक के लगातार समसूत्री विभाजन से 8-केंद्रकीय भ्रूणकोष (8-Nucleate Embryo Sac) बनता है।
प्रतिव्यासांत कोशिकाएँ (Antipodals)
भ्रूणकोष के चालाजल सिरे पर मौजूद तीन कोशिकाओं को प्रतिव्यासांत कोशिकाएँ (Antipodal Cells) कहा जाता है।
केंद्रीय कोशिका (Central Cell)
दो ध्रुवीय केंद्रक (Polar Nuclei) एक सामान्य झिल्ली में उपस्थित होकर केंद्रीय कोशिका बनाते हैं।
अंड समुच्चय (Egg Apparatus)
माइक्रोपाइल वाले सिरे पर स्थित तीन कोशिकाओं को मिलाकर अंड समुच्चय (Egg Apparatus) कहा जाता है।
इसमें होते हैं:
- एक अंड कोशिका (Egg Cell)
- दो सहायक कोशिकाएँ (Synergids)
सिनर्जिड्स (Synergids)
अंड कोशिका के दोनों ओर मौजूद दो कोशिकाओं को सिनर्जिड्स कहते हैं।
फिलिफॉर्म उपकरण (Filiform Apparatus)
सिनर्जिड कोशिका में कोशिका भित्ति के अंदर की ओर बने विशेष उभारों को फिलिफॉर्म उपकरण कहा जाता है।
यह परागनलिका को सिनर्जिड तक पहुँचने का मार्ग दिखाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
एक परिपक्व भ्रूणकोष 8-केंद्रकीय और 7-कोशिकीय होता है।
16. परागण (Pollination)
पुंकेसर के परागकोष से परागकणों का अंडप या स्त्रीकेसर के ग्रहणशील वर्तिकाग्र तक पहुँचना परागण कहलाता है।
परागण मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है:
- स्व-परागण (Self-Pollination)
- पर-परागण (Cross-Pollination)
स्व-परागण
जब परागकण उसी फूल के वर्तिकाग्र तक पहुँचते हैं, तो इसे स्व-परागण कहा जाता है। इसमें किसी बाहरी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती।
स्व-परागण में शामिल हैं:
- ऑटोगैमी (Autogamy)
- गाइटोनोगैमी (Geitonogamy)
17. ऑटोगैमी (Autogamy)
एक ही फूल के परागकोष से उसी फूल के वर्तिकाग्र तक परागकणों के पहुँचने को ऑटोगैमी कहते हैं।
ऑटोगैमी निम्न स्थितियों द्वारा हो सकती है:
- होमोगैमी (Homogamy)
- क्लिस्टोगैमी (Cleistogamy)
होमोगैमी (Homogamy)
जब किसी द्विलिंगी फूल के परागकोष और वर्तिकाग्र एक ही समय पर परिपक्व होते हैं, तो इस स्थिति को होमोगैमी कहते हैं।
उदाहरण: Mirabilis
क्लिस्टोगैमी (Cleistogamy)
इसमें फूल बंद रहते हैं, जिसके कारण स्व-परागण होता है। कुछ पौधों में यह फूल आने के मौसम के अंतिम समय में देखा जाता है।
उदाहरण: Oxalis और Viola
18. गाइटोनोगैमी (Geitonogamy)
एक ही पौधे के एक फूल के परागकोष से दूसरे फूल के वर्तिकाग्र तक परागकणों के स्थानांतरण को गाइटोनोगैमी कहा जाता है।
उदाहरण: Cucurbita
ध्यान दें: होमोगैमी और क्लिस्टोगैमी ऑटोगैमी को बढ़ावा देते हैं।
19. चास्मोगैमस और क्लिस्टोगैमस फूल
चास्मोगैमस फूल (Chasmogamous Flowers)
- ये खुले हुए फूल होते हैं।
- इनमें पर-परागण की संभावना रहती है।
- ये फूल अक्सर स्पष्ट और आकर्षक होते हैं।
क्लिस्टोगैमस फूल (Cleistogamous Flowers)
- ये बंद फूल होते हैं।
- इनमें केवल स्व-परागण संभव होता है।
- ये फूल अधिक स्पष्ट या आकर्षक नहीं होते।
चास्मोगैमस फूल का उदाहरण: Hibiscus
क्लिस्टोगैमस फूलों के उदाहरण: Oxalis और Viola
20. पर-परागण – जीनोगैमी (Xenogamy)
जब एक पौधे के फूल के परागकोष से परागकण उसी प्रजाति के किसी दूसरे पौधे के फूल के वर्तिकाग्र तक पहुँचते हैं, तो इसे जीनोगैमी (Xenogamy) कहते हैं।
इस प्रक्रिया में आनुवंशिक रूप से अलग प्रकार के परागकण वर्तिकाग्र तक पहुँचते हैं।
21. परागण कारक (Pollinators)
परागण के दौरान परागकणों को एक फूल से दूसरे फूल तक पहुँचाने वाले वाहकों या माध्यमों को परागण कारक (Pollinators) कहा जाता है।
परागण कारकों को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा जाता है:
- अजैविक कारक (Abiotic Agents)
- वायु
- जल
- जैविक कारक (Biotic Agents)
- जंतु
22. अजैविक परागण (Abiotic Pollination)
वायु और जल अजैविक परागण कारक के रूप में कार्य करते हैं।
एनीमोफिली – वायु द्वारा परागण
जब परागकण वायु की सहायता से स्थानांतरित होते हैं, तो इसे एनीमोफिली (Anemophily) कहते हैं।
उदाहरण: चावल, मक्का और जई।
एनीमोफिली के लिए आवश्यक विशेषताएँ
- परागकण हल्के होने चाहिए।
- फूल चास्मोगैमस होने चाहिए।
- परागकण चिपचिपे नहीं होने चाहिए।
- वर्तिकाग्र चिपचिपा होना चाहिए।
- फूलों का आकर्षक होना सामान्यतः आवश्यक नहीं होता।
- परागकण बड़ी संख्या में बनने चाहिए।
हाइड्रोफिली – जल द्वारा परागण
जब परागकणों का स्थानांतरण जल की सहायता से होता है, तो इसे हाइड्रोफिली (Hydrophily) कहते हैं।
उदाहरण: Vallisneria, Hydrilla और Zostera
हाइड्रोफिली के लिए आवश्यक विशेषताएँ
- परागकण हल्के होने चाहिए।
- फूल चास्मोगैमस होने चाहिए।
- परागकणों के चारों ओर म्यूसिलेज (Mucilaginous) आवरण होना चाहिए।
- परागकोष लंबे डंठल पर मौजूद हो सकता है।
- वर्तिकाग्र लंबा और चिपचिपा होना चाहिए।
23. जैविक परागण (Biotic Pollination)
जंतु, कीट, चमगादड़ और पक्षी जैविक परागण कारक के रूप में कार्य करते हैं।
जूफिली (Zoophily)
जंतुओं द्वारा होने वाले परागण को जूफिली कहते हैं।
एंटोमोफिली (Entomophily)
कीटों द्वारा होने वाले परागण को एंटोमोफिली कहते हैं।
उदाहरण: गुलाब और Star Jasmine
काइरोप्टेरोफिली (Chiropterophily)
चमगादड़ों द्वारा होने वाले परागण को काइरोप्टेरोफिली कहा जाता है।
ऑर्निथोफिली (Ornithophily)
पक्षियों द्वारा होने वाले परागण को ऑर्निथोफिली कहा जाता है।
उदाहरण: Butea और Bombax
24. जैविक परागण के लिए आवश्यक विशेषताएँ
- परागकण चिपचिपे होने चाहिए।
- फूल आकर्षक, चमकीले रंग के या अच्छी सुगंध वाले होने चाहिए।
- फूलों में कीटों के बैठने के लिए उपयुक्त स्थान होना चाहिए।
- परागकण हल्के होने चाहिए।
- परागकण बड़ी संख्या में बनने चाहिए।
- चमगादड़ों द्वारा परागण होने की स्थिति में फूल रात में खिलने चाहिए।
पोलन बेड (Pollen Bed): परागकण पर मौजूद वह परत जो उसे चिपचिपा बनाती है।
प्रीपोटेंसी (Prepotency): वह स्थिति जिसमें दूसरे फूल के परागकण उसी फूल के परागकणों की तुलना में वर्तिकाग्र पर तेजी से अंकुरित होते हैं।
25. परागकण-स्त्रीकेसर पारस्परिक क्रिया (Pollen-Pistil Interaction)
वर्तिकाग्र पर परागकण के पहुँचने से लेकर परागनलिका के बीजांड में प्रवेश करने तक होने वाली घटनाओं को परागकण-स्त्रीकेसर पारस्परिक क्रिया कहा जाता है।
संगत परागकण की पहचान
स्त्रीकेसर सही या संगत (Compatible) परागकण की पहचान करके उसे स्वीकार कर सकता है और असंगत परागकण को अस्वीकार कर सकता है।
परागकण की पहचान और उसके स्वीकार या अस्वीकार होने की प्रक्रिया परागकण तथा स्त्रीकेसर के रासायनिक घटकों के बीच होने वाली पारस्परिक क्रिया का परिणाम है।
सही परागकण की पहचान होने के बाद स्त्रीकेसर निषेचन तक पहुँचाने वाली परागण-पश्चात घटनाओं को बढ़ावा देता है।
26. परागनलिका की वृद्धि
जब कोई परागकण संगत स्त्रीकेसर के वर्तिकाग्र पर पहुँचता है, तो परिपक्व वर्तिकाग्र द्वारा स्रावित शर्करायुक्त द्रव की प्रतिक्रिया में उसका अंकुरण हो सकता है।
परागनलिका वर्तिकाग्र और वर्तिका से होते हुए बीजांड की ओर बढ़ती है।
बीजांड तक पहुँचने के बाद परागनलिका दो नर युग्मकों को वहाँ पहुँचाती है।
27. कृत्रिम संकरण (Artificial Hybridisation)
कृत्रिम संकरण फसल सुधार कार्यक्रमों में उपयोग की जाने वाली प्रमुख विधियों में से एक है।
इस प्रक्रिया में परागण के लिए केवल इच्छित परागकणों का उपयोग किया जाता है और वर्तिकाग्र को अनचाहे परागकणों से बचाया जाता है।
इसके लिए दो मुख्य प्रक्रियाएँ अपनाई जाती हैं:
- पुंकेसर निष्कासन (Emasculation)
- बैगिंग (Bagging)
पुंकेसर निष्कासन (Emasculation)
जब मादा जनक में द्विलिंगी फूल होते हैं, तब परागकोष के फटने से पहले चिमटी की सहायता से फूल की कली से परागकोषों को निकाल दिया जाता है। इस प्रक्रिया को Emasculation कहते हैं।
बैगिंग (Bagging)
पुंकेसर हटाए गए फूल को उपयुक्त आकार की थैली, सामान्यतः बटर पेपर की थैली, से ढक दिया जाता है। इससे वर्तिकाग्र को अनचाहे परागकणों से बचाया जाता है। इसे Bagging कहते हैं।
ध्यान दें: यदि मादा जनक का फूल एकलिंगी है, तो Emasculation की आवश्यकता नहीं होती।
28. द्विनिषेचन (Double Fertilisation)
द्विनिषेचन में दो प्रकार की संलयन घटनाएँ होती हैं:
- सिंगैमी (Syngamy)
- त्रिसंलयन (Triple Fusion)
सिंगैमी (Syngamy)
एक नर युग्मक मादा युग्मक के साथ संलयित होकर युग्मनज (Zygote) बनाता है।
नर युग्मक + मादा युग्मक → युग्मनज
त्रिसंलयन (Triple Fusion)
दूसरा नर युग्मक दो ध्रुवीय केंद्रकों के साथ संलयित होकर प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (Primary Endosperm Nucleus – PEN) बनाता है।
नर युग्मक + दो ध्रुवीय केंद्रक → प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (3n)
द्विनिषेचन
एक ही भ्रूणकोष में सिंगैमी और त्रिसंलयन दोनों होने के कारण इस घटना को द्विनिषेचन (Double Fertilisation) कहा जाता है।
इस प्रक्रिया को सबसे पहले Nawaschin ने 1898 में Lilium और Fritillaria में प्रदर्शित किया था।
निषेचन में दोनों नर युग्मकों की भागीदारी आवृतबीजी पौधों की एक विशेषता है।
29. युग्मनज का पोषण
युग्मनज भ्रूण बनने के लिए भ्रूणपोष (Endosperm) से पोषण प्राप्त करता है।
भ्रूणपोष वह ऊतक है जो विकसित हो रहे भ्रूण और विभाजित हो रहे केंद्रक को पोषण प्रदान करता है।
30. बहिःप्रजनन युक्तियाँ (Outbreeding Devices)
बहिःप्रजनन युक्तियाँ स्व-परागण को रोकती हैं और द्विलिंगी फूलों में भी पर-परागण को बढ़ावा देती हैं।
हरकोगैमी (Herkogamy)
हरकोगैमी ऐसी व्यवस्था है जो स्व-परागण को रोककर पर-परागण को बढ़ावा देती है।
31. भ्रूणजनन (Embryogenesis)
युग्मनज से समसूत्री विभाजन द्वारा भ्रूण बनने की प्रक्रिया को भ्रूणजनन (Embryogenesis) कहा जाता है।
32. माइक्रोपाइल छिद्र
माइक्रोपाइल एक छोटा छिद्र है, जो जल के अवशोषण और खनिजों के आदान-प्रदान में सहायता करता है।
33. निषेचन-पश्चात संरचनाएँ एवं घटनाएँ
द्विनिषेचन के तुरंत बाद निषेचन-पश्चात (Post-Fertilisation) घटनाएँ शुरू हो जाती हैं।
इनमें शामिल हैं:
- भ्रूणपोष (Endosperm) का विकास
- भ्रूण (Embryo) का विकास
- बीजांड का बीज में बदलना
- अंडाशय का फल में बदलना
34. भ्रूणपोष का विकास
भ्रूणपोष का विकास भ्रूण के विकास से पहले होता है।
यह प्रक्रिया निम्न चरणों में होती है:
- प्राथमिक भ्रूणपोष कोशिका (Primary Endosperm Cell – PEC) लगातार विभाजित होकर त्रिगुणित भ्रूणपोष ऊतक बनाती है।
- प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक लगातार मुक्त-केंद्रकीय विभाजन करता है और अनेक स्वतंत्र केंद्रक बनाता है। इस अवस्था को मुक्त-केंद्रकीय भ्रूणपोष (Free-Nuclear Endosperm) कहा जाता है।
- बाद में भ्रूणपोष कोशिकीय हो जाता है।
ध्यान दें: भ्रूणपोष का मुख्य कार्य विकसित हो रहे भ्रूण को पोषण प्रदान करना है।
35. भ्रूण का विकास
युग्मनज के विकास से भ्रूण बनता है। भ्रूण के विकास की इस प्रक्रिया को भ्रूणविकास (Embryogeny) कहा जाता है।
- चालाजल ध्रुव की ओर स्थित सघन कोशिकाद्रव्य वाली छोटी पुत्री कोशिका को टर्मिनल सेल, एपिकल सेल या एम्ब्रायोनल सेल कहा जाता है।
- माइक्रोपाइल वाले सिरे की ओर स्थित अपेक्षाकृत बड़ी पुत्री कोशिका को बेसल सेल (Basal Cell) कहा जाता है।
- बेसल सेल अनुप्रस्थ रूप से विभाजित होकर सस्पेंसर कोशिकाएँ बनाती है।
36. द्विबीजपत्री में भ्रूणविकास
एक सामान्य द्विबीजपत्री पौधे में युग्मनज लंबा होता है और अनुप्रस्थ भित्ति द्वारा दो असमान कोशिकाओं में विभाजित हो जाता है।
- बड़ी बेसल कोशिका को सस्पेंसर कोशिका कहा जाता है। इसमें एक बड़ी केंद्रीय रिक्तिका होती है।
- एंटीपोडल सिरे की ओर स्थित छोटी टर्मिनल कोशिका को भ्रूण कोशिका (Embryo Cell) कहा जाता है।
सस्पेंसर कोशिका कई बार अनुप्रस्थ विभाजन करके 6–10 कोशिकाओं वाला तंतुमय सस्पेंसर बनाती है।
सस्पेंसर भ्रूण को भ्रूणपोष के अंदर धकेलने में सहायता करता है।
माइक्रोपाइल की ओर सस्पेंसर की पहली कोशिका को हॉस्टोरियम (Haustorium) कहा जाता है।
भ्रूण के पास स्थित सस्पेंसर की कोशिका को हाइपोफाइसिस (Hypophysis) कहते हैं। यह मूलांकुर (Radicle) और मूल टोपी (Root Cap) बनाती है।
भ्रूण कोशिका दो ऊर्ध्वाधर और एक अनुप्रस्थ विभाजन करके आठ कोशिकाएँ बनाती है, जो दो स्तरों में व्यवस्थित होती हैं:
- एपिबेसल (Epibasal)
- हाइपोबेसल (Hypobasal)
एपिबेसल कोशिकाएँ आगे चलकर दो बीजपत्र (Cotyledons) और प्रांकुर (Plumule) बनाती हैं।
हाइपोबेसल कोशिकाएँ उसके शीर्ष को छोड़कर हाइपोकोटाइल का निर्माण करती हैं।
शुरुआत में भ्रूण गोलाकार और अविभेदित होता है। इसे प्रोएम्ब्रियो (Proembryo) कहा जाता है।
आगे चलकर निम्न संरचनाओं के विकास से यह पूर्ण भ्रूण में बदल जाता है:
- मूलांकुर (Radicle) – जड़
- प्रांकुर (Plumule) – प्ररोह
- बीजपत्र (Cotyledons)
दोनों ओर से दो बीजपत्र विकसित होते हैं और उनके बीच प्रांकुर दिखाई देता है। इस अवस्था में भ्रूण हृदय के आकार का दिखाई देता है।
37. द्विबीजपत्री भ्रूण की संरचना
एक सामान्य द्विबीजपत्री भ्रूण में एक भ्रूणीय अक्ष (Embryonal Axis) और दो बीजपत्र (Cotyledons) होते हैं।
बीजपत्रों के स्तर से ऊपर भ्रूणीय अक्ष के भाग को एपिकोटाइल (Epicotyl) कहा जाता है। इसका अंतिम भाग प्ररोह शीर्ष अर्थात प्रांकुर (Plumule) होता है।
बीजपत्रों के स्तर से नीचे वाले भाग को हाइपोकोटाइल (Hypocotyl) कहा जाता है। इसका अंतिम भाग जड़ शीर्ष अर्थात मूलांकुर (Radicle) होता है।
जड़ के शीर्ष को मूल टोपी (Root Cap) ढकती है।
उदाहरण: आम, सेब, गुलाब और मूली।
38. एकबीजपत्री में भ्रूणविकास
एकबीजपत्री पौधों में युग्मनज लंबा होकर अनुप्रस्थ रूप से विभाजित होता है और एक बेसल कोशिका तथा एक टर्मिनल कोशिका बनाता है।
- बेसल कोशिका एक बड़ी, फूली हुई और रिक्तिकायुक्त सस्पेंसर कोशिका बनाती है।
- टर्मिनल कोशिका एक और अनुप्रस्थ विभाजन करके दो कोशिकाएँ बनाती है।
- ऊपरी कोशिका कई विभाजनों के बाद प्रांकुर तथा एक बीजपत्र बनाती है। इस एक बीजपत्र को स्क्यूटेलम (Scutellum) कहा जाता है।
- हाइपोफाइसीय क्षेत्र की निचली कोशिका बढ़ती है और अंतिम प्रांकुर को एक ओर धकेलती है।
- प्रांकुर एक गड्ढेनुमा भाग में स्थित हो जाता है।
- मध्य कोशिका कई विभाजनों के बाद हाइपोकोटाइल और एपिकोटाइल बनाती है।
- इसमें एक छोटी सस्पेंसर कोशिका भी होती है।
कुछ अनाजों में प्रांकुर और मूलांकुर विशेष आवरणों से ढके होते हैं:
- प्रांकुर को ढकने वाले आवरण को कोलिओप्टाइल (Coleoptile) कहते हैं।
- मूलांकुर को ढकने वाले आवरण को कोलिओराइजा (Coleorhiza) कहते हैं।
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