Chapter 7

Alternating Current

  • BoardJAC
  • Class12th (SCI.)
  • SubjectPhysics
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Notes

1. विद्युत धारा (Electric Current)

किसी तार में विद्युत आवेश या इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह को विद्युत धारा (Electric Current) कहते हैं।

2. विद्युत धारा के प्रकार (Types of Electric Current)

  1. दिष्ट धारा (Direct Current – D.C.)
  2. प्रत्यावर्ती धारा (Alternating Current – A.C.)

दिष्ट धारा (Direct Current – D.C.)

वह विद्युत धारा जिसकी दिशा किसी लोड (Load) से प्रवाहित होते समय समय के साथ नहीं बदलती है, दिष्ट धारा (D.C.) कहलाती है।

direct-current-graph

D.C. के लिए:

I = Q/t

साथ ही:

I = ne/t

तथा:

I = neAvd

प्रत्यावर्ती धारा (Alternating Current – A.C.)

वह विद्युत धारा जिसकी दिशा किसी लोड से प्रवाहित होते समय आवर्ती रूप से (Periodically) बदलती रहती है, प्रत्यावर्ती धारा (A.C.) कहलाती है।

alternating-current-waveforms

प्रत्यावर्ती धारा को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है:

I = I0 sin(ωt + φ)

इसी प्रकार प्रत्यावर्ती वोल्टेज को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है:

V = V0 sin(ωt + φ)

या:

V = ε = ε0 sin(ωt + φ)

वह धारा जो ज्यावक्रीय तरंग या फलन (Sinusoidal Wave or Function) की तरह परिवर्तित होती है, प्रत्यावर्ती धारा कहलाती है।

प्रत्यावर्ती धारा में प्रयुक्त पद (Terms Used in Alternating Current)

  • I: A.C. का तात्क्षणिक धारा मान (Instantaneous Current)
  • I0: A.C. का अधिकतम मान (Maximum Value)
  • ωt + φ: समय t पर कला (Phase)
  • φ: प्रारंभिक कला या कला नियतांक (Initial Phase or Phase Constant)
  • ω = 2πf: कोणीय आवृत्ति (Angular Frequency)
  • t: समय
  • f = 1/T: आवृत्ति (Frequency)
  • A: क्षेत्रफल (Area)
  • B: चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field)

एकसमान चुंबकीय क्षेत्र में घूमती हुई कुंडली के लिए:

I0 = NABω

3. आवर्तकाल (Time Period)

एक पूर्ण चक्र (Cycle) पूरा करने में लगने वाले समय को आवर्तकाल (Time Period) कहते हैं।

T = 2π/ω

साथ ही:

T = 1/f

यहाँ 2π एक पूर्ण चक्र में कोणीय विस्थापन (Angular Displacement) है।

4. आवृत्ति (Frequency)

एक सेकंड में पूर्ण किए गए चक्रों की संख्या को आवृत्ति (Frequency) कहते हैं।

f = चक्रों की संख्या / समय

f = 1/T

साथ ही:

ω = 2πf

भारत में:

f = 50 Hz = 50 cps

अतः:

ω = 2π × 50 = 314 rad/s

U.S. में:

f = 60 Hz

5. शिखर या अधिकतम मान / आयाम (Peak or Maximum Value / Amplitude)

A.C. के अधिकतम मान को उसका शिखर मान (Peak Value) या आयाम (Amplitude) कहते हैं।

इसे निम्न प्रकार दर्शाया जाता है:

धारा के लिए: I0

वोल्टेज के लिए: V0

घूर्णनशील कुंडली के लिए:

I0 = NABω

शिखर मान किसी भी दिशा में हो सकता है, अर्थात धनात्मक या ऋणात्मक।

6. कला (Phase)

कला (Phase) एक भौतिक राशि है।

यह तात्क्षणिक मान तथा दिशा को दर्शाती है।

यह एक विमाहीन राशि (Dimensionless Quantity) है।

इसका SI मात्रक रेडियन (Radian – rad) है।

7. कला-अंतर (Phase Difference)

विद्युत धारा की कला तथा वोल्टेज की कला के बीच के अंतर को कला-अंतर (Phase Difference) कहते हैं।

माना:

V = V0 sin(ωt + φ1)

तथा:

I = I0 sin(ωt + φ2)

अतः:

कला-अंतर, φ = φ2 − φ1

8. A.C. के महत्वपूर्ण बिंदु (Important Points of A.C.)

  • A.C. का उत्पादन A.C. जनित्र (Generator) या डायनेमो (Dynamo) द्वारा किया जाता है।
  • A.C. को ~ प्रतीक द्वारा दर्शाया जाता है।
  • रेक्टिफायर (Rectifier) की सहायता से A.C. को D.C. में बदला जा सकता है।
  • इन्वर्टर (Inverter) की सहायता से D.C. को A.C. में बदला जा सकता है।
  • यह इलेक्ट्रोप्लेटिंग (Electroplating) या इलेक्ट्रोलिसिस (Electrolysis) उत्पन्न कर सकती है।
  • इसे हॉट-वायर एमीटर (Hot-Wire Ammeter) की सहायता से मापा जा सकता है।
  • ट्रांसफॉर्मर (Transformer) की सहायता से इसे अधिक शक्ति हानि के बिना लंबी दूरी तक प्रेषित किया जा सकता है।
  • इसका उत्पादन कम खर्चीला होता है।
  • इसका उत्पादन अधिक किफायती होता है।
  • इसके वोल्टेज को आसानी से बढ़ाया (Step-Up) या घटाया (Step-Down) जा सकता है।
  • इसे आसानी से संचित किया जा सकता है।
  • यह बहुत खतरनाक होती है।

9. A.C. और D.C. में अंतर (Difference Between A.C. and D.C.)

प्रत्यावर्ती धारा (Alternating Current)

  1. इसकी दिशा आवर्ती रूप से बदलती रहती है।
  2. इसका परिमाण साइन फलन (Sine Function) की तरह बदलता है।
  3. इसे संचित किया जा सकता है।
  4. इसकी आवृत्ति 50 Hz होती है।
  5. इलेक्ट्रॉन आगे-पीछे गति करते हैं।
  6. यह अधिक खतरनाक होती है।
  7. इसे लंबी दूरी तक प्रेषित किया जा सकता है।
  8. इसका प्रतीक ~ है।
  9. इसका ग्राफ ज्यावक्रीय (Sinusoidal) होता है।
  10. इसका स्रोत A.C. जनित्र या डायनेमो होता है।
  11. प्रेषण में ऊर्जा की हानि बहुत कम होती है।
  12. रेक्टिफायर की सहायता से इसे D.C. में बदला जा सकता है।
  13. यह इलेक्ट्रोप्लेटिंग उत्पन्न नहीं कर सकती है।

दिष्ट धारा (Direct Current)

  1. इसकी दिशा स्थिर रहती है।
  2. इसका परिमाण स्थिर रहता है।
  3. इसे संचित नहीं किया जा सकता है।
  4. इसकी आवृत्ति शून्य होती है।
  5. इलेक्ट्रॉन एक ही दिशा में गति करते हैं।
  6. यह खतरनाक नहीं होती है।
  7. इसे लंबी दूरी तक प्रेषित नहीं किया जा सकता है।
  8. इसका प्रतीक स्थिर धारा को दर्शाता है।
  9. समय के साथ इसका ग्राफ स्थिर रहता है।
  10. इसके स्रोत D.C. जनित्र, बैटरी, सेल तथा वोल्टाइक सेल हैं।
  11. प्रेषण में ऊर्जा की हानि बहुत अधिक होती है।
  12. इन्वर्टर की सहायता से इसे A.C. में बदला जा सकता है।
  13. यह इलेक्ट्रोलिसिस (Electrolysis) उत्पन्न कर सकती है।

10. फेजर आरेख (Phasor Diagram)

एक ऐसा आरेख जिसमें समान आवृत्ति वाली प्रत्यावर्ती धारा या प्रत्यावर्ती वोल्टेज को उनके बीच कला कोण (Phase Angle) सहित घूमते हुए सदिश या फेजर के रूप में दर्शाया जाता है, फेजर आरेख (Phasor Diagram) कहलाता है।

फेजर एक ज्यामितीय राशि (Geometrical Quantity) है।

यह वास्तविक भौतिक राशि नहीं है।

धारा और वोल्टेज को दर्शाने वाले घूर्णनशील सदिशों को फेजर (Phasors) कहते हैं।

सदिश की लंबाई अधिकतम या शिखर मान को दर्शाती है।

किसी निश्चित अक्ष पर सदिश का प्रक्षेप प्रत्यावर्ती धारा या वोल्टेज का तात्क्षणिक मान देता है।

phasor-diagram-of-alternating-current

ज्यावक्रीय धारा का निरूपण (Illustration of Sinusoidal Current)

मान लीजिए कि कोई कण घूर्णन अक्ष के चारों ओर I0 त्रिज्या के वृत्ताकार पथ पर गति करता है।

वृत्तीय गति से:

sin θ = y/I0

अतः:

y = I0 sin θ

चूँकि:

θ = ωt

अतः:

I = I0 sin ωt

sinusoidal-current-from-rotating-phasor

विभिन्न समयों पर तात्क्षणिक मान

t = 0 पर:

I = 0

t = T/4 पर:

I = +I0

t = T/2 पर:

I = 0

t = 3T/4 पर:

I = −I0

t = T पर:

I = 0

पश्चगामी (Lag)

Lag उस कला-अंतर को दर्शाता है जिसमें एक राशि दूसरी राशि से पीछे होती है।

अग्रगामी (Lead)

Lead उस कला-अंतर को दर्शाता है जिसमें एक राशि दूसरी राशि से आगे होती है।

lead-and-lag-phase-diagram

11. A.C. का औसत या माध्य मान (Average or Mean Value of A.C.)

चूँकि:

I = I0 sin ωt

एक पूर्ण चक्र में A.C. का औसत मान शून्य होता है। इसलिए A.C. के औसत मान को अर्ध-चक्र (Half Cycle) के लिए परिभाषित किया जाता है।

A.C. का औसत मान D.C. का वह मान है, जो समान परिस्थितियों में किसी परिपथ में आधे चक्र के दौरान उतना ही आवेश प्रवाहित करे, जितना A.C. उसी परिपथ में प्रवाहित करती है।

इसे Iav या Im द्वारा दर्शाया जाता है।

औसत मान की व्युत्पत्ति (Derivation of Average Value)

चूँकि:

I = I0 sin ωt

तथा:

I = dq/dt

अतः:

dq = I dt

अर्ध-चक्र में कुल आवेश:

q = ∫0T/2 I0 sin ωt dt

माना:

ωt = u

तब:

dt = du/ω

अतः:

q = (I0/ω) ∫0π sin u du

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